🎂 जन्माष्टमी पर केक काटने की परंपरा – नया चलन (Is cutting cake on Janmashtami right or wrong)
पिछले कुछ वर्षों में एक नया ट्रेंड सामने आया है—कुछ लोग श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर केक काटकर भगवान का जन्मदिन मनाते हैं। हालांकि, इस पर अक्सर विवाद होता है कि यह तरीका धार्मिक दृष्टि से सही है? (Is cutting cake on Janmashtami right or wrong
🌟 जन्माष्टमी का धार्मिक महत्व
सनातन धर्म में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का अत्यधिक महत्व है। यह दिन भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के उपलक्ष्य में श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस वर्ष यह पावन पर्व 16 अगस्त 2025 को मनाया जाएगा।
इस दिन भक्त:
- ठाकुर जी का सोलह श्रृंगार करते हैं
- सुंदर वस्त्र, आभूषण और पुष्प अर्पित करते हैं
- भजन-कीर्तन करते हैं
- और सात्विक भोग लगाकर पूजा करते हैं।
🙏 संत प्रेमानंद जी महाराज का दृष्टिकोण
वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद जी महाराज ने इस विषय पर स्पष्ट मत दिया है। सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो में एक भक्त ने उनसे प्रश्न किया:
“क्या जन्माष्टमी पर केक काटकर ठाकुर जी का जन्मदिन मनाना उचित है?”
इस पर संत जी ने उत्तर दिया:
“बेकरी में बने केक, चाहे अंडा युक्त हों या अंडा रहित, उनकी शुद्धता की पूर्ण गारंटी नहीं होती। ऐसे पदार्थ पूजा और भोग के लिए उपयुक्त नहीं माने जाते। धर्मशास्त्रों में ‘अभक्ष्य’ (जो खाया न जाए) वस्तुओं को भोग में वर्जित किया गया है।“
📿 क्या कहता है सनातन धर्म?
- भगवान की पूजा में शुद्धता और सात्विकता सर्वोपरि होती है।
- बिना अंडा और बिना लहसुन-प्याज के सात्विक भोजन ही भोग रूप में स्वीकार्य है।
- बेकरी के उत्पाद—even eggless cakes—भी अकसर अशुद्धता और मशीन-निर्मित प्रक्रिया के कारण भोग योग्य नहीं माने जाते।
✅ क्या करें जन्माष्टमी पर?
जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव पारंपरिक रूप से मनाना ही श्रेष्ठ होता है:
- माखन-मिश्री, फल, पंचामृत और घर का बना हुआ सात्विक भोग अर्पित करें
- भजन-कीर्तन, झूला झुलाना, और संकीर्तन जैसे कार्यक्रम करें
- बच्चों को श्रीकृष्ण की लीलाओं से परिचित कराएं
🔚 निष्कर्ष: परंपरा से न जुड़ें आधुनिकता के नाम पर
संत प्रेमानंद जी महाराज का मत स्पष्ट है—केक काटना आधुनिक दिखावे की परंपरा हो सकती है, लेकिन यह सनातन धर्म की शुद्ध भक्ति भावना से मेल नहीं खाती। ऐसे में हमें चाहिए कि हम श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को परंपरागत और सात्विक रूप से ही मनाएं।




