संस्कारम विश्वविद्यालय में बसंत पंचमी पर वैदिक हवन, ज्ञान और संस्कारों का अनुपम संगम
संस्कारम विश्वविद्यालय परिसर में आज बसंत पंचमी का पावन पर्व अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और भारतीय परंपराओं के अनुरूप हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। ज्ञान, विद्या और विवेक की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती की आराधना हेतु विश्वविद्यालय द्वारा वैदिक विधि से हवन एवं पूजा-अर्चना का भव्य आयोजन किया गया।
Vasant Panchami at Sanskaram University: श्रद्धा, परंपरा और वैदिक विधि से मनाया गया ज्ञान का महापर्व
संस्कारम विश्वविद्यालय परिसर में आज बसंत पंचमी का पावन पर्व अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और भारतीय परंपराओं के अनुरूप हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। ज्ञान, विद्या और विवेक की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती की आराधना हेतु विश्वविद्यालय द्वारा वैदिक विधि से हवन एवं पूजा-अर्चना का भव्य आयोजन किया गया। इस आध्यात्मिक अवसर पर विश्वविद्यालय के विद्यार्थी, शिक्षकगण, अधिकारी एवं कर्मचारी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे और पूरे समर्पण भाव के साथ कार्यक्रम में सहभागिता की।
वैदिक मंत्रोच्चार से गूंजा विश्वविद्यालय परिसर
कार्यक्रम की शुरुआत वैदिक मंत्रों के विधिवत उच्चारण के साथ हुई। आचार्यों द्वारा हवन कुंड में अग्नि प्रज्वलित कर शास्त्रोक्त विधि से आहुतियाँ अर्पित की गईं। मंत्रोच्चार और यज्ञ की पवित्र अग्नि से संपूर्ण परिसर भक्तिमय, शांत और सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण हो गया। उपस्थित सभी लोगों ने माँ सरस्वती से ज्ञान, विवेक, सद्बुद्धि और उज्ज्वल भविष्य की कामना की।
विद्यार्थियों ने अनुशासन और श्रद्धा भाव के साथ हवन में भाग लिया, जिससे यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान न रहकर संस्कारों और मूल्यों की जीवंत अभिव्यक्ति बन गया।
चांसलर डॉ. महिपाल जी का प्रेरणादायी संबोधन
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के चांसलर डॉ. महिपाल जी ने उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा कि बसंत पंचमी भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा का अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है। यह पर्व हमें यह स्मरण कराता है कि ज्ञान मानव जीवन का मूल आधार है। उन्होंने कहा कि शिक्षा केवल पुस्तकों और परीक्षाओं तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसका प्रभाव हमारे आचरण, विचार और सामाजिक उत्तरदायित्व में स्पष्ट रूप से दिखाई देना चाहिए।
डॉ. महिपाल जी ने आगे कहा कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि अच्छे संस्कारों से युक्त एक जागरूक, जिम्मेदार और संवेदनशील नागरिक का निर्माण करना है। जब शिक्षा और संस्कार एक साथ चलते हैं, तभी समाज और राष्ट्र का समग्र विकास संभव होता है।

माँ सरस्वती: ज्ञान, विवेक और आत्मविकास की प्रतीक
उन्होंने भारतीय परंपरा में माँ सरस्वती के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि माँ सरस्वती को ज्ञान, बुद्धि और विवेक की अधिष्ठात्री देवी माना गया है। उनका ज्ञान मनुष्य को सही और गलत के बीच अंतर करना सिखाता है तथा उसे आत्मविकास के साथ-साथ समाज के कल्याण की दिशा में प्रेरित करता है। ऐसे आयोजनों के माध्यम से विद्यार्थी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ते हैं और भारतीय मूल्यों को गहराई से समझते हैं।
संस्कार और संस्कृति से जुड़ने का अवसर
हवन एवं पूजा के माध्यम से विद्यार्थियों को न केवल आध्यात्मिक शांति प्राप्त हुई, बल्कि उन्हें भारतीय संस्कृति, वैदिक परंपराओं और जीवन मूल्यों से जुड़ने का भी अवसर मिला। विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा इस प्रकार के आयोजनों का उद्देश्य विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के साथ-साथ नैतिक और सांस्कृतिक चेतना को सुदृढ़ करना है।
समापन पर सामूहिक मंगलकामना
हवन के उपरांत सभी उपस्थित लोगों ने माँ सरस्वती के चरणों में नमन कर विश्वविद्यालय की निरंतर प्रगति, विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य और समाज के सर्वांगीण कल्याण की कामना की। यह आयोजन संस्कारम विश्वविद्यालय की उस प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जिसमें शिक्षा के साथ संस्कार और संस्कृति को समान महत्व दिया जाता है।




