₹597 करोड़ मनी लॉन्ड्रिंग घोटाला: 19 ठिकानों पर ED की बड़ी कार्रवाई, 90 बैंक अकाउंट फ्रीज

IDFC First Bank scam: देश में वित्तीय घोटालों के खिलाफ कार्रवाई के तहत Enforcement Directorate (ED) ने शुक्रवार को बड़े स्तर पर छापेमारी की। यह कार्रवाई करीब 597 करोड़ रुपये के मनी लॉन्ड्रिंग मामले से जुड़ी है।

जांच एजेंसी ने इस मामले में 19 अलग-अलग स्थानों पर छापे मारते हुए कई अहम दस्तावेज और डिजिटल सबूत जब्त किए हैं। इसके साथ ही संदिग्ध लेन-देन से जुड़े 90 बैंक खातों को फ्रीज कर दिया गया है।

यह छापेमारी Chandigarh, Mohali, Panchkula, Gurugram और Bengaluru समेत कई शहरों में की गई।

IDFC फर्स्ट बैंक घोटाले से जुड़ा मामला

जांच एजेंसी के मुताबिक यह पूरा मामला IDFC First Bank से जुड़े एक बड़े वित्तीय घोटाले से संबंधित है।

बताया गया है कि सरकारी विभागों के खातों में जमा लगभग 597 करोड़ रुपये की सार्वजनिक धनराशि का गबन किया गया। यह राशि सावधि जमा (FD) के रूप में बैंक में सुरक्षित रखी जानी थी, लेकिन आरोपियों ने बिना अनुमति इसका दुरुपयोग किया।

जांच में सामने आया है कि इस पैसे को कई फर्जी कंपनियों और शेल संस्थाओं के माध्यम से इधर-उधर ट्रांसफर किया गया।

हरियाणा सरकार के खातों से जुड़ा मामला

ED के अनुसार यह मामला Haryana Government के विकास एवं पंचायत विभाग और अन्य सरकारी खातों से जुड़ा हुआ है।

जांच के दौरान पता चला कि इन सरकारी खातों में मौजूद राशि और बैंक रिकॉर्ड में अंतर पाया गया। इसी आधार पर फरवरी 2026 में एफआईआर दर्ज की गई थी और उसके बाद मनी लॉन्ड्रिंग की जांच शुरू की गई।

फर्जी कंपनियों के जरिए किया गया घोटाला

जांच एजेंसियों के अनुसार इस घोटाले को अंजाम देने के लिए कई शेल कंपनियों का इस्तेमाल किया गया।

इनमें स्वास्तिक देश प्रोजेक्ट्स, कैपको फिनटेक सर्विसेज, मां वैभव लक्ष्मी इंटीरियर्स और एसआरआर प्लानिंग गुरुस प्राइवेट लिमिटेड जैसी कंपनियां शामिल हैं।

आरोप है कि इन कंपनियों के खातों में पहले बड़ी मात्रा में सरकारी धनराशि ट्रांसफर की गई और फिर उसे अलग-अलग माध्यमों से निकाल लिया गया।

सोना खरीदने के नाम पर की गई हेराफेरी

ED की जांच में एक चौंकाने वाला तरीका भी सामने आया है।

जांच एजेंसी के मुताबिक अधिकांश रकम को ज्वैलर्स के बैंक खातों के माध्यम से ट्रांसफर किया गया। इसके लिए फर्जी बिल बनाए गए ताकि ऐसा लगे कि सोना खरीदा गया है।

दरअसल यह केवल एक दिखावा था, जिसके जरिए अवैध धन को वैध दिखाने की कोशिश की गई।

पूर्व बैंक कर्मचारियों पर भी आरोप

इस पूरे घोटाले में बैंक के कुछ पूर्व कर्मचारियों की भूमिका भी सामने आई है।

ED के अनुसार रिभव ऋषि और अभय कुमार जैसे पूर्व बैंक कर्मचारियों ने फर्जी कंपनियों के माध्यम से सरकारी धन को गबन करने में मदद की।

बताया गया है कि रिभव ऋषि ने जून 2025 में बैंक से इस्तीफा दे दिया था। जांच में यह भी सामने आया कि घोटाले की कुछ राशि उनके और उनकी पत्नी दिव्या अरोरा के खातों में भी ट्रांसफर की गई।

रियल एस्टेट कारोबारी पर भी शक

जांच में मोहाली के एक होटल व्यवसायी और रियल एस्टेट डेवलपर विक्रम वाधवा का नाम भी सामने आया है।

ED के मुताबिक बड़ी मात्रा में धन सीधे उनके बैंक खाते में पहुंचाया गया। इसके बाद यह पैसा प्रिस्मा रेजिडेंसी LLP, किंसपायर रियल्टी LLP और मार्टेल बिल्डवेल LLP जैसी रियल एस्टेट कंपनियों में निवेश किया गया।

हालांकि छापेमारी के दौरान विक्रम वाधवा का पता नहीं चल सका और बताया जा रहा है कि वह फिलहाल फरार है।

कई संस्थाओं से बरामद हुए अहम सबूत

छापेमारी के दौरान जांच एजेंसी ने कई कंपनियों और संस्थाओं के परिसरों की तलाशी ली।

इस दौरान बड़ी मात्रा में दस्तावेज, डिजिटल रिकॉर्ड और लेन-देन से जुड़े सबूत बरामद किए गए हैं।

जांच में यह भी सामने आया कि चंडीगढ़ मेगा स्टोर नामक संस्था के माध्यम से भी बड़ी रकम की हेराफेरी की गई थी। इस मामले में संस्था के साझेदार मोहित गोयल से भी पूछताछ की जा रही है।

जांच जारी, और खुलासे संभव

ED ने बताया कि फिलहाल मामले की जांच जारी है और आने वाले समय में इस घोटाले से जुड़े और लोगों के नाम सामने आ सकते हैं।

जांच एजेंसी यह पता लगाने में जुटी है कि इस घोटाले का नेटवर्क कितना बड़ा है और इसमें किन-किन लोगों की भूमिका रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला देश के बड़े वित्तीय घोटालों में शामिल हो सकता है।

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