शिक्षा

63% स्टूडेंट्स रोज झेल रहे हैं स्ट्रेस, पढ़ाई नहीं बल्कि माता-पिता की उम्मीदें बन रहीं सबसे बड़ा दबाव

Student stress due to parental pressure: पढ़ाई का बोझ, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और सबसे ऊपर माता-पिता की उम्मीदें—आज के छात्र इन्हीं तीन पाटों के बीच पिस रहे हैं। हालिया रिपोर्ट बताती है कि तनाव अब अपवाद नहीं, बल्कि छात्रों की रोज़मर्रा की सच्चाई बन चुका है, जो उनके मानसिक स्वास्थ्य और बचपन दोनों को निगल रहा है।

Student stress due to parental pressure: पढ़ाई का बोझ, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और सबसे ऊपर माता-पिता की उम्मीदें—आज के छात्र इन्हीं तीन पाटों के बीच पिस रहे हैं। हालिया रिपोर्ट बताती है कि तनाव अब अपवाद नहीं, बल्कि छात्रों की रोज़मर्रा की सच्चाई बन चुका है, जो उनके मानसिक स्वास्थ्य और बचपन दोनों को निगल रहा है।

रिषभ की किताबें खुली हैं, टाइम-टेबल भी परफेक्ट है, लेकिन चेहरे से मुस्कान गायब है। यह परीक्षा का डर नहीं, बल्कि उस दबाव का नतीजा है जो उससे उम्मीद करता है कि वह “सबसे बेहतर” साबित हो। उसके माता-पिता रिश्तेदारों में उसके नंबरों की चर्चा करते हैं, जबकि रिषभ भीतर ही भीतर टूट रहा है। यह कहानी सिर्फ रिषभ की नहीं, बल्कि आज के हर दूसरे छात्र की है।

हालिया रिपोर्ट The Student Sync Index ने छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर एक चौंकाने वाली तस्वीर पेश की है। रिपोर्ट के मुताबिक, 63% छात्र रोज़ाना तनाव में जी रहे हैं, और इनमें से 42% ने साफ तौर पर माना कि उनके तनाव की बड़ी वजह माता-पिता की उम्मीदें हैं

हर दिन बढ़ता तनाव का ग्राफ

रिपोर्ट बताती है कि कक्षा में बैठे हर 10 में से 6 छात्र पढ़ाई से ज्यादा चिंता और दबाव महसूस करते हैं। प्रतिस्पर्धा का स्तर इतना बढ़ चुका है कि बच्चों को गलती करने की आज़ादी ही नहीं मिलती। शिक्षक इस तनाव को पहचानते तो हैं, लेकिन स्कूल सिस्टम और सीमित काउंसलिंग सुविधाओं के कारण वे माता-पिता की सोच नहीं बदल पाते।

सबसे बड़ी समस्या यह है कि कई माता-पिता यह मानने को तैयार ही नहीं होते कि अनजाने में वे ही बच्चों के तनाव की जड़ बन रहे हैं।

‘विद्या के मंदिर’ से ‘प्रतिस्पर्धा का कुरुक्षेत्र’

स्कूल, जो कभी सीखने और जिज्ञासा की जगह हुआ करते थे, अब प्रदर्शन और तुलना के मैदान बनते जा रहे हैं। नंबर, रैंक और रिज़ल्ट बच्चों की पहचान बनते जा रहे हैं। नतीजा—बचपन हार रहा है और तनाव जीत रहा है।

रिपोर्ट के आंकड़े सिर्फ नंबर नहीं हैं, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ी की चीख हैं। जब घर, जो सबसे सुरक्षित जगह होनी चाहिए, वही दबाव का कारण बन जाए—तो बच्चे कहां जाएं?

माता-पिता की उम्मीदें: प्रेरणा या बोझ?

उम्मीदें गलत नहीं हैं, लेकिन जब वे बच्चे की क्षमता, रुचि और मानसिक स्थिति से बड़ी हो जाती हैं, तो बोझ बन जाती हैं।
“शर्मा जी के बेटे से तुलना”, “इतनी मेहनत के बाद भी इतने ही नंबर?”—ये वाक्य बच्चे के आत्मविश्वास को अंदर से खोखला कर देते हैं।

बच्चों में दिखने वाले तनाव के शुरुआती संकेत

माता-पिता अगर समय रहते इन लक्षणों को पहचान लें, तो बड़ी परेशानी से बचा जा सकता है:

  • अचानक चुप रहने लगना
  • नींद या भूख के पैटर्न में बदलाव
  • चिड़चिड़ापन या गुस्सा
  • पढ़ाई से डर या बचने की कोशिश

समाधान क्या है? घर से शुरुआत जरूरी

तनाव कम करने की शुरुआत स्कूल से पहले घर से करनी होगी।

  • तुलना के जाल से बचें: हर बच्चा अलग है, उसकी क्षमता भी।
  • बिना मोबाइल 30 मिनट: रोज़ थोड़ी देर पूरी एकाग्रता से बच्चे की बात सुनें।
  • मेहनत की तारीफ करें, सिर्फ नंबरों की नहीं: बच्चे को महसूस हो कि आपका प्यार रिपोर्ट कार्ड से जुड़ा नहीं है।
  • पढ़ाई से अलग बातचीत: दिन में कम से कम एक बार ऐसी बात करें, जिसका स्कूल से कोई लेना-देना न हो।

अगर हमें तनाव का यह ग्राफ नीचे लाना है, तो बच्चों को “इन्वेस्टमेंट” नहीं, इंसान समझना होगा। जब तक घर और स्कूल दोनों जगह गलती करने की आज़ादी और भावनात्मक सुरक्षा नहीं मिलेगी, तब तक 63% का यह आंकड़ा सिर्फ एक शुरुआत साबित होगा।

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