“यह सूर्य का साल है…” गुरु कृपा से रचित ‘श्री सत्यमेव जयते’ दर्शनशास्त्र, अब PMO तक पहुंचाने की अपील

Satyamev Jayate philosophy book: “जय जय जयते… श्री सत्यमेव जयते” केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि सात वर्षों की कठोर साधना, गुरु भक्ति और राष्ट्र प्रथम की भावना से उपजा एक दर्शन है। मकर संक्रांति के पावन अवसर पर यह भाव उस समय और अधिक सशक्त हो उठा, जब दर्शनशास्त्र ‘श्री सत्यमेव जयते’ के रचयिता महेन्द्र सिंह राठौड़ ने द फ्रीडम न्यूज़ जयपुर कार्यालय में शिष्टाचार भेंट के दौरान अपने जीवन, साधना और दर्शन की यात्रा साझा की।

सूर्य तत्व और गुरु परंपरा से जन्मा दर्शन

लेखक के अनुसार यह “सूर्य का साल” है—जहां यथार्थ, धर्म और कर्म का समन्वय स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। श्री सूर्य नारायण, धरती माता और नाथ परंपरा के गुरुजनों की कृपा से यह दर्शनशास्त्र आकार ले सका।
लेखक मानते हैं कि गुरु बिना ज्ञान अधूरा है और उनके लिए श्री राजेंद्र सूरी गुरु केवल एक तस्वीर नहीं, बल्कि जीवन की दिशा और तक़दीर रहे।

सात वर्षों की साधना, एक वैश्विक दर्शन

‘श्री सत्यमेव जयते’ दर्शनशास्त्र केवल आध्यात्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि राष्ट्र, प्रकृति और मानव कर्तव्य का समग्र दर्शन प्रस्तुत करता है। इसमें—

  • राष्ट्र प्रथम की अवधारणा
  • किसान और धरती माता के सम्मान की बात
  • सूर्य तत्व आधारित मुद्रा (Currency–Atlas Logo Concept)
  • पर्यावरण संरक्षण और मानवीय उत्तरदायित्व

को सरल लेकिन गहन शब्दों में अभिव्यक्त किया गया है।

ISBN और कॉपीराइट के साथ प्रकाशित

लेखक ने बताया कि उन्होंने लंबे समय तक तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्रालय (वर्तमान Ministry of Education) से प्रकाशन की प्रतीक्षा की। 2023 तक प्रयासों के बाद निराश होकर 2024 में Notion Press, Chennai से बसंत पंचमी के शुभ दिन इस ग्रंथ का प्रकाशन कराया गया।
पुस्तक का ISBN: 979-8-88975-555-5 है और भारत सरकार से कॉपीराइट भी प्राप्त हो चुका है।

PMO तक पहुंचाने की गुहार

लेखक का सबसे बड़ा आग्रह है कि इस दर्शनशास्त्र को Prime Minister’s Office (PMO) और शिक्षा मंत्रालय तक पहुंचाया जाए। उनका मानना है कि 21वीं सदी का यह दर्शन भारत ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर संवाद की क्षमता रखता है।

वे करबद्ध निवेदन करते हैं कि देश के प्रधानमंत्री Narendra Modi स्वयं समय निकालकर मारवाड़ आएं और इस दर्शनशास्त्र का गरिमामय विमोचन करें।

क्षत्रिय परंपरा और राष्ट्रधर्म

लेखक स्वयं को मारवाड़ की उस क्षत्रिय परंपरा से जोड़ते हैं, जिसने राष्ट्र और स्वामीभक्ति के लिए इतिहास रचा। वे स्वयं को वीर Durgadas Rathore के वंश से बताते हैं—जिन्होंने जोधपुर के उत्तराधिकारी अजीत सिंह की रक्षा के लिए मुगल सत्ता से लोहा लिया।

लेखक याद दिलाते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री Atal Bihari Vajpayee ने 3 अक्टूबर 1998 को मसूरिया पहाड़ी पर वीर दुर्गादास राठौड़ की प्रतिमा का अनावरण किया था—जो राष्ट्र प्रथम की भावना का प्रतीक है।

धरती माता और मानव उत्तरदायित्व

‘श्री सत्यमेव जयते’ दर्शनशास्त्र में धरती माता को केंद्र में रखा गया है। लेखक कहते हैं—

“करोड़ों वर्षों से धरती ने सब प्राणियों का भार सहा है, अब उसकी रक्षा का दायित्व मानव के कंधों पर है।”

यह दर्शन पर्यावरण, नैतिकता और कर्तव्यबोध को जोड़ते हुए मानवता को चेताने का प्रयास है।

एक किसान, शिक्षक और लेखक के रूप में महेन्द्र सिंह राठौड़ की यह यात्रा केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि राष्ट्र और विश्व के लिए संदेश है। उनका आग्रह है कि राष्ट्रहित में इस दर्शनशास्त्र को उचित मंच और मान्यता मिले, ताकि आने वाली पीढ़ियां इससे प्रेरणा ले सकें।

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