खेजड़ी वृक्षों की कटाई पर भड़के विधायक रविन्द्र भाटी, सोलर कंपनियों पर लगाया सबूत जलाने का आरोप

📍 बाड़मेर में खेजड़ी वृक्षों की कटाई पर विवाद (Controversy over felling of Khejri trees, विधायक भाटी ने लिया सख्त रुख

राजस्थान के बाड़मेर जिले में खेजड़ी वृक्षों की अवैध कटाई को लेकर बड़ा विवाद (Controversy over felling of Khejri trees) सामने आया है। शिव विधायक रविन्द्र सिंह भाटी ने बरियाड़ा और खोडाल गांव के ग्रामीणों की शिकायत के बाद इस मुद्दे पर सख्त रुख अपनाते हुए दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है।

🔥 सबूत मिटाने की साजिश? रात में जला दिए पेड़!

ग्रामीणों का आरोप है कि सोलर कंपनियों ने यह जानकर कि रविवार सुबह विधायक और प्रशासन मौके पर निरीक्षण करने आ सकते हैं, रात के अंधेरे में पेड़ों को जला दिया

  • पहले से काटे गए खेजड़ी और अन्य संरक्षित वृक्षों को आग के हवाले कर दिया गया।
  • यह कृत्य न केवल पर्यावरणीय अपराध है, बल्कि कानून का भी खुला उल्लंघन है।
  • ग्रामीणों का कहना है कि यह पूरी कार्रवाई पूर्व नियोजित थी।

💬 विधायक भाटी का कड़ा बयान: “कानून को खुली चुनौती दे रही हैं ये कंपनियां”

विधायक रविन्द्र भाटी ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा:

“खेजड़ी राजस्थान की पहचान है, इसे उजाड़ने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। सबूत जलाना दर्शाता है कि कंपनियां अपराध को छुपाना चाहती हैं। हम समझौता नहीं करेंगे।”

⛺ मौके पर पहुंचे विधायक, धरने पर बैठे ग्रामीणों के साथ

विधायक भाटी रविवार को स्वयं ग्रामीणों के साथ घटना स्थल पर पहुंचे और कंपनी प्रबंधन के खिलाफ धरने पर बैठ गए।
उन्होंने स्पष्ट किया:

“जब तक दोषियों पर कड़ी कार्रवाई नहीं होती, तब तक यह आंदोलन जारी रहेगा। जरूरत पड़ी तो इसे राज्य और राष्ट्रीय स्तर तक उठाया जाएगा।”

ग्रामीणों ने भी एक स्वर में विधायक का समर्थन करते हुए कहा कि “यह सिर्फ पर्यावरण की लड़ाई नहीं, बल्कि न्याय की लड़ाई है।”

🌿 खेजड़ी: राजस्थान की जीवनरेखा

खेजड़ी सिर्फ एक पेड़ नहीं, बल्कि थार के पर्यावरण संतुलन, मिट्टी के संरक्षण, और स्थानीय जैव विविधता का आधार है। इस पेड़ का संरक्षण करना न केवल कानूनी बाध्यता है, बल्कि सांस्कृतिक जिम्मेदारी भी।


“खेजड़ी वृक्षों की कटाई पर विवाद” केवल एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि प्रशासन, स्थानीय जनता और कानून व्यवस्था की बड़ी परीक्षा है। यदि समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो यह मामला राजस्थान की पर्यावरणीय नीति पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर सकता है।

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