NSIL 2026 Summit: जयपुर। विकसित भारत–2047 के लक्ष्य को साकार करने में उच्च शिक्षा की निर्णायक भूमिका को केंद्र में रखते हुए राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संस्थागत नेतृत्व शिखर सम्मेलन (NSIL–2026) का समापन 17 फरवरी 2026 को राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर में गरिमामय वातावरण में हुआ। यह सम्मेलन शिक्षा जगत के शीर्ष नेतृत्व, नीति-निर्माताओं और शिक्षाविदों के लिए राष्ट्रीय संकल्प का मंच बना।
कार्यक्रम में राजस्थान के राज्यपाल Haribhau Kisanrao Bagde मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। विशिष्ट अतिथि के रूप में राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष Vasudev Devnani तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 क्रियान्वयन समीक्षा समिति के अध्यक्ष M Jagadesh Kumar शामिल हुए। कार्यक्रम का शुभारंभ राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान से हुआ तथा राजस्थान विश्वविद्यालय की कुलगुरु Alpana Kateja ने अतिथियों का स्वागत किया।
राज्यपाल का संदेश: शिक्षा से हो समग्र व्यक्तित्व निर्माण
राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े ने अपने उद्बोधन में कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री प्रदान करना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों की बौद्धिक क्षमता, संस्कार और व्यक्तित्व का समग्र विकास करना है। उन्होंने कहा कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए विचारों को व्यवहार में उतारना आवश्यक है और इसमें शिक्षकों की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।
उन्होंने प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि अंग्रेजों के आगमन के समय भारत में लगभग आठ लाख गुरुकुल संचालित थे। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान के समन्वय का सशक्त माध्यम है, जिससे शिक्षा व्यवस्था आत्मनिर्भर और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बन सकेगी।
राज्यपाल ने प्राथमिक शिक्षा पर विशेष जोर देते हुए सकारात्मक सोच और नैतिक मूल्यों के संवर्धन की आवश्यकता बताई।
नई शिक्षा नीति 2020: बदलाव का आधार
प्रो. एम. जगदीश कुमार ने कहा कि भारत की विविधतापूर्ण उच्च शिक्षा व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए सुधारों को चरणबद्ध और समयबद्ध रूप से लागू करना होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि औपनिवेशिक विरासत से प्रभावित शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन एक दिन में संभव नहीं है, किंतु वैश्विक प्रतिस्पर्धा और तकनीकी बदलावों के इस दौर में सुधारों को गति देना अनिवार्य है।
उन्होंने “कम्पिटेंसी पोर्टफोलियो” की अवधारणा पर बल देते हुए कहा कि विद्यार्थियों को केवल डिग्री नहीं, बल्कि कौशल और अनुभव आधारित शिक्षा दी जानी चाहिए। परियोजना आधारित अधिगम, सतत मूल्यांकन और नवाचार को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है।
विधानसभा अध्यक्ष का दृष्टिकोण: नेतृत्व और मूल्य आधारित शिक्षा
विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने कहा कि विश्वविद्यालय केवल रोजगारोन्मुख संस्थान नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चरित्र निर्माण के केंद्र होने चाहिए। उन्होंने तक्षशिला, विक्रमशिला और नालंदा जैसी प्राचीन शिक्षा परंपराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत पुनः वैश्विक ज्ञान नेतृत्व की दिशा में अग्रसर हो सकता है।
उन्होंने कहा कि किसी भी शिक्षण संस्था का चरित्र उसके नेतृत्व पर निर्भर करता है। स्पष्ट लक्ष्य, मूल्य और राष्ट्र दृष्टि से युक्त नेतृत्व ही विद्यार्थियों को सही दिशा दे सकता है।
वैश्विक प्रतिस्पर्धा और भारतीय ज्ञान परंपरा का समन्वय
सम्मेलन में शिक्षा को आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत–2047 से जोड़ने पर विशेष बल दिया गया। वक्ताओं ने कहा कि भारत नवाचार, अनुसंधान और पेटेंट के क्षेत्र में प्रगति कर रहा है, परंतु वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अग्रणी बनने के लिए संस्थागत सुधार आवश्यक हैं।
कुलगुरु प्रो. अल्पना कटेजा ने कहा कि प्रत्येक छात्र की विशिष्ट पहचान को समझते हुए शिक्षण संस्थानों को नवाचार और संरचनात्मक परिवर्तन की दिशा में आगे बढ़ना होगा। उन्होंने सम्मेलन को “ज्ञान–यज्ञ” बताते हुए कहा कि यह जयपुर के शैक्षिक इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा।
जयपुर डिक्लरेशन और संस्थागत विकास योजना
सम्मेलन में “जयपुर डिक्लरेशन” के छह स्तंभ—विकास, विचार, विमर्श, विधि, विस्तार और विद्वान—को व्यवहार में उतारने पर जोर दिया गया। संस्थानों को अपना Institutional Development Plan तैयार करने और उद्योग–अकादमिक सहयोग बढ़ाने का सुझाव दिया गया।
आयुक्त कॉलेज शिक्षा डॉ. ओ.पी. बैरवा ने एवीजीसी जैसे उभरते क्षेत्रों में आधुनिक लैब्स और संसाधनों की आवश्यकता पर बल दिया। कार्यक्रम का संचालन प्रो. संजय शर्मा तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. सुनील कुमार जांगिड़ ने किया। देशभर के विश्वविद्यालयों, आईआईटी, आईआईएम के कुलपति और शिक्षाविद इस अवसर पर उपस्थित रहे।




