नज़रिया

मुलायम सिंह यादव- अखाड़े से संसद तक का सफर

सहज व्यक्तित्व के धनी मुलायम सिंह का कद किसी भी पद से बड़ा रहा। उनकी विराट राजनीतिक छवि और जुदा अंदाज समाजवादियों के लिए भगवान तो आमजनों के लिए सियासत के महायोद्धा से कम नहीं था। अन्यथा यों ही किसी सियासी शख्सियत को यों ही मसीहा मान पूजा नहीं जाता। आजादी के बाद की पीढ़ी के हजारों नेता समाजवादी आंदोलन की राह पर निकले लेकिन किसी को मुलायम सिंह जैसा कद, पद, सम्मान, अपार जनसमर्थन और सत्ता का शिखर हासिल नहीं हुआ। मुलायम सिंह अपनी जिंदादिली, फौलादी निर्णय और असीमित परिश्रम बूते सत्ता के सोपान पर चढ़ते गए। एक सामान्य परिवार से निकलकर प्रदेश और देश की सियासत में असाधारण पहचान बनाना कोई आसान काम नहीं होता। लेकिन मुलायम सिंह यादव ने यह करिश्मा कर दिखाया।

मुलायम सिंह यादव का जन्म 22 नवंबर, 1939 को इटावा जिले के छोटे से गांव सैफई में किसान परिवार में हुआ। उनके पिता सुधर सिंह यदव उन्हें अखाड़े के एक सर्वोच्च पहलवान के रुप में देखना चाहते थे। मुलायम सिंह यादव उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए अखाड़े में उतर गए और अपने चरखा दांव के बूते अपने समकालीन सभी पहलवानों को कड़ी शिकस्त दी। मुलायम सिंह यादव समाजवादी नेता रामसेवक यादव के विचारों से अत्याधिक प्रभावित थे और उन्होंने उनके आशीर्वाद से राजनीति में समाजवाद की संकलपना को पूरा करने का प्रण लिया। मुलायम सिंह यादव वैचारिक रुप से समाजवादी महानायक डाॅ0 राम मनोहर लोहिया से खासे प्रभावित रहे और वे समाजवादी आंदोलन के सिपाही बन गए। 1967 में जब वे पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए चुने गये तो वे विधानसभा के युवा सदस्यों में से एक थे। वह दौर कांग्रेस की राजनीतिक-आर्थिक नीतियों के खिलाफ बगावत और विद्रोह का दौर था। समाजवाद उफान मार रहा था। डाॅ0 लोहिया का यह कथन चारो तरफ गूंज रहा था कि-गैर-बराबरी को खत्म किए बिना समतामूलक समाज का निर्माण संभव नहीं है। तब डाॅक्टर लोहिया ने मुलायम सिंह यादव का पीठ थपथपाते हुए कहा था कि जिस दिन तुम कांग्रेस को साधना सीख जाओगे उस दिन तुम्हें आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं पाएगा। फिर क्या था, मुलायम सिंह यादव ने लोहिया की सुक्ति को गांठबांध अपनी सियासत का मूलमंत्र बना लिया। 1967 के विधानसभा चुनाव में वे जसवंतनगर विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस के दिग्गज लाखन सिंह को पटकनी दी और कांग्रेस पर नकेल डालना सीख लिया। लेकिन पहली बार मंत्री बनने के लिए मुलायम सिंह यादव को 1977 तक इंतजार करना पड़ा, जब कांग्रेस विरोधी लहर में देश के अन्य राज्यों के साथ उत्तर प्रदेश में भी जनता पार्टी की सरकार बनी। 1980 में भी वे कांग्रेस की सरकार में राज्य मंत्री रहे और फिर चैधरी चरण सिंह के लोकदल के अध्यक्ष बने। लेकिन विधानसभा चुनाव हार गए। लेकिन उनका हौसला कमजोर नहीं पड़ा। वे समाजवादी नेताओं के साथ कंधा जोड़ते हुए कांग्रेस के एकाधिकार और अपराजेय होने के दंभ को चुनौती देने लगे।

1989 के विधानसभा चुनावों के बाद वे भारी जनादेश के साथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। उनका प्रारंभिक कार्यकाल 5 दिसंबर 1989 से 24 जनवरी 1991 तक रहा। लेकिन मंडल आयोग की घोषणा के बाद देश की राजनीति करवट लेने लगी और भारतीय समाज का राजनीतिक ध्रुवीकरण शुरु हो गया। तब भारतीय जनता पार्टी ने अयोध्या में भगवान श्रीराम मंदिर निर्माण का सवाल उठाकर राजनीति को घुमावदार मोड़ पर ला दिया। इसके जवाब में मुलायम सिंह यादव ने पिछड़ा-दलित और मुसलमानों को जोड़ते हुए 1993 में बहुजन समाज पार्टी से तालमेल कर एक नए राजनीतिक-सामाजिक समीकरण को जन्म दिया। हालांकि वह अच्छी तरह जानते थे कि इस गठबंधन से बहुत कुछ राजनीतिक-सामाजिक परिवर्तन होने वाला नहीं है। इसके बावजूद भी उन्होंने इस राजनीतिक गठजोड़ को बनाए रखने का भरपूर प्रयास किया और 5 दिसंबर, 1993 से 3 जून, 1996 तक हुकूमत की। लेकिन यह गठबंधन प्रभावी साबित नहीं हुआ और मुलायम सिंह यादव को सत्ता से बाहर होना पड़ा। सत्ता पाने की आपाधापी में बहुजन समाज पार्टी ने भाजपा के साथ समझौता कर लिया लेकिन यह सियासी समझौता भी परवान नहीं चढ़ सका। इसके बाद उत्तर प्रदेश सत्ता के लिए राजनीतिक जोड़तोड़ के कई प्रयोग हुए लेकिन हर प्रयोग विफल रहा। इस राजनीतिक परिस्थिति का लाभ उठाते हुए मुलायम सिंह यादव ने सत्ता में पुनः वापसी की और 29 अगस्त, 2003 से 11 मई, 2007 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे।

गौर करें तो मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश की सियासत तक ही सीमित नहीं रहे। वे अपने जुझारु तेवर और सियासी गोलबंदी के बुते केंद्रीय राजनीति के धुरी बन गए। केंद्रीय राजनीति में उनका प्रवेश 1996 में हुआ जब कांग्रेस पार्टी को हराकर केंद्र में संयुक्त मोर्चा की सरकार बनी। तत्कालीन एचडी देवगौड़ा की नेतृत्ववाली सरकार में वे रक्षामंत्री बने। लेकिन यह सरकार बहुत अधिक दिनों तक नहीं चली और तीन वर्षों में देश को दो प्रधानमंत्री देने के बाद सत्ता से बाहर हो गयी। लेकिन मुलायम सिंह यादव केंद्र में सरकारों के गठन के किंगमेकर बने रहे। वे कई बार संसद के लिए चुने गए और अभी भी संसद के सदस्य थे। एक बार तो उन्हें प्रधानमंत्री बनने का मौका हाथ लगा लेकिन उनके बढ़ते कद से बेचैन उनके ही साथी उनके विरोध में उतर आए। लेकिन मुलायम सिंह को इसका तनिक भी अफसोस नहीं रहा। उनके लिए राष्ट्रवाद, लोकतंत्र, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता असल पूंजी और सर्वोच्च प्राथमिकता रही। वे भारतीय भाषाओं की मजबूती और हिंदी को भारत भर में स्वीकार्यता के लिए लगातार प्रयासरत रहे। अब मुलायम सिंह यादव नहीं रहे लेकिन भारत राष्ट्र के निर्माण और समाज में एकता और समरसता के लिए उनके हौसले को सदैव याद किया जाएगा। 1992 में उनके द्वारा स्थापित समाजवादी पार्टी आज कठिन चुनौतियों का सामना कर रही है। पार्टी ही नहीं बल्कि उनका परिवार भी बिखराव के झंझावातों से जूझ रहा है। लेकिन देखा गया कि मुलायम सिंह यादव इस कठिन परिस्थिति से भी निराश नहीं हुए।

दरअसल उन्हें विश्वास था कि उनकी पार्टी उनके सुयोग्य पुत्र और उत्तराधिकारी अखिलेश यादव के हाथ में है और वे कड़े संघर्षों के बूते मुकाम हासिल कर लेंगे। मुलायम सिंह यादव ने जब 1992 में समाजवादी पार्टी की नींव डाली तब भी राजनीतिक संक्रमण का ही दौर था। लेकिन उन्होंने अपने दूरगामी निर्णय और राजनीतिक सुझबुझ से पार्टी का इकबाल बुलंदी पर पहुंचा दिया। उन्होंने अपने राजनीतिक विरोधियों को कुटनीतिक मात देते हुए समाजवाद के बीज को वटवृक्ष बना दिया। अपने धुन के पक्के मुलायम सिंह यादव अपने सिद्धांतों और विचारों से समझौता भीं किया तो सिर्फ देश के लिए। उन्होंने विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर के साथ मिलकर काम किया। कांगे्रसी नेता राजीव गांधी से भी राजनीतिक तालमेल किया। लेकिन सियासी समर में एकला योद्धा की तरह चलने वाले मुलायम सिंह यादव ने किसी भी राजनेता से निर्देशित होना स्वीकार नहीं किया। याद होगा 1999 में उनके समर्थन का आश्वासन न मिलने से कांग्रेस सरकार बनाने में विफल रही। वहीं अमेरिका से परमाणु करार के मसले पर डाॅ मनमोहन सिंह की नेतृत्ववाली यूपीए सरकार का समर्थन देकर सबको चैंका दिया। जबकि डाॅ0 मनमोहन सिंह की सरकार गिराने के लिए सभी राजनीतिक दल गोलबंद हो गये थे। याद होगा तब उनके इस ऐतिहासिक कदम को न्यूयार्क टाइम्स सहित विश्व के तमाम पत्र-पत्रिकाओं ने खुलकर सराहना की।

अब राजनीति के कैनवास पर स्थापित उनके राजनीतिक मानदंड और मूल्य ही शेष रह गए हैं जिसे देश हमेशा याद रखेगा।

द फ्रीडम स्टॉफ
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