देश

हिंदुस्तान में अंग्रेजी के दौर में हिंदी के लिए संघर्ष करने वाले डा सुबास पाणी

हिंदीतर क्षेत्र की पहचान बन चुके डा सुबास पाणी स्व प्रयासों से पिछले दो दशक से हिंदी की वास्तविक पहचान बनाने के लिए सक्रिय हैं| हिंदी के प्रति अटूट लगन रझते हुए भारत सरकार के प्रमुख प्रतिष्ठानों एवं लोक उद्यमों के उच्च प्रबंधन के साथ बैठक कर हिंदी के व्यापक हित में फैसले करा रहे हैं| अपनी निरंतर सक्रियता की दीप से दीप जलाकर डा सुबास हिंदी को एक नई ऊँचाई प्रदान कर रहे हैं| हिंदी को तकनीक से जोड़ने एवं भारत वर्ष में सर्व प्रथम तकनीकी संगोष्ठी का आयोजन करने का श्रेय डा सुबास को जाता है|

भारतीय राजभाषा परिषद् में राष्ट्रीय सचिव

उड़ीसा राज्य के डा सुबास ने हिंदी के प्रति अटूट लगन रखते हुए हिंदी विषय से उच्च स्तर की पढाई उत्कल विश्वविद्यालय, उड़ीसा एवं भागलपुर विश्वविद्यालय, बिहार से पूरी की है| सुबास पहले व्यक्ति हैं जो भारतीय राजभाषा परिषद् में राष्ट्रीय सचिव के पद पर योगदान दे रहे हैं| विशेष रूप से इन्होंने राष्ट्रीय स्तर की संगोष्ठी का आयोजन सभी हिंदीतर राज्यों में करके प्रबुद्ध जनों का ध्यान आकृष्ट किया है वहीँ कविता-कहानी जैसे साहित्यिक पक्ष को लेकर भी हिंदी जनों को जागरूक किया है|

राष्ट्रीय एकता पुरस्कार एवं राजीव गाँधी सद्भावना पुरस्कार से सम्मानित

डा सुबास पाणी के साहित्यिक योगदान को देखते हुए इन्हें विभिन्न सरकारी एवं लोक उद्यमों जैसे स्टील एथारिटी आफ इंडिया लिमिटेड, एनटीपीसी, एम सी एल, बैंक आफ इंडिया, इलाहाबाद बैंक, कैनरा बैंक, पंजाब नेशनल बैंक आदि विभिन्न संस्थाओं द्वारा हिंदी के महत्वपूर्ण पुरस्कारों से नवाजा गया है वहीँ इनके सामाजिक योगदान को देखते हुए राष्ट्रीय एकता पुरस्कार एवं राजीव गाँधी सद्भावना पुरस्कार भी प्रदान किया गया है|

डा सुबास ने हिंदी वार्षिक संगोष्ठियों की वजह से हिंदीतर क्षेत्र में हिंदी की पहचान बढ़ाई है| डा सुबास ने हिंदीतर कृतियों के प्रकाशन का भी जिम्मा उठाया है ताकि हिंदीतर भाषा की रचनात्मकता से भी हिंदी जगत को परिचित कराया जा सके| जरुरत है डा सुबास की तरह कर्मठ व्यक्तिव की ताकि हिंदी सदैव दिलों में राज करती रहे

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