नज़रिया

डलमऊ: जहां होली वाला दिन खुशी का नहीं मातम का दिन है- राजेंद्र वैश्य

उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले में एक जगह ऐसी भी है जहाँ जब दुनिया के आसमान में रंगों के बादल होते हैं तो यहाँ गमों के बादल होते हैं। मैं बात कर रहा हूँ रायबरेली जिला की दक्षिणी दिशा में गंगा नदी के किनारे स्थित प्राक्रतिक सुन्दरता से लबरेज़ एक ऐसे कस्बे “डलमऊ” की जहाँ होली निर्धारित तिथि के तीन दिन बाद मनाई जाती है और इन तीन दिनों तक यहां के लोग शोक मनाते हैं अपने राजा डलदेव की मृत्यु का, जो होली के दिन वीरगति को प्राप्त हुए थे।

अतीत में डलमऊ बहुत ही समृद्ध और वैभवशाली हुआ करता था। डलमऊ के लोग गंगा-जमुनी तहजीब के नुमाइन्दे थे और अभी भी डलमऊ की जमी गंगा-जमुनी तहज़ीब में डूबी हुई है। उस समय डलमऊ में दूर दराज से लोग नावों से आते थे और यहीं से व्यापार करने के लिए राज्य के अन्य भागों में जाते थे। वैभवशाली डलमऊ की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। इसी वजह से अन्य राजा डलमऊ की सम्पन्नता से बहुत ईर्ष्या का भाव रखते थे किन्तु वो उनसे टक्कर लेने में सक्षम ना थे क्योंकि डलमऊ की प्रजा डलमऊ की आन-बान-शान के लिए अपने प्राण हमेशा हथेली पर रखती थी।

डलमऊ की भव्यता से कुढ़ने वाले तो अनेक राजा थे पर जौनपुर का धूर्त राजा इब्राहीम शर्की, डलदेव और डलमऊ से कुछ ज्यादा ही शत्रु भाव रखता था पर वह डलमऊ की ताकत को भली भांति जानता था इसलिए वह सीधे युद्ध करने की हिम्मत नही जुटा पा रहा था। ऐसे में उसने एक कुटिल षड्यंत्र रचा डलमऊ को परास्त करने का। पूरे जगत में पता था की राजा डलदेव होली के दिन अपनी प्रजा के साथ ठंडाई-भंग छानते हुए होली के त्योहार में मशगूल रहते हैं। इस पर धूर्त इब्राहीम शर्की ने सोचा अगर होली के दिन डलमऊ पर चोरी छिपे हमला कर दिया जाये तो राजा डलदेव और डलमऊ को परास्त किया जा सकता है।

धूर्त इब्राहीम शर्की ने होली के दिन जब डलमऊ वासी अपने राजा के साथ होली के रंगों में सराबोर थे तो उसी समय युद्ध की परम्पराओ को ताक पर रखकर डलमऊ पर हमला कर दिया। अचानक हुए हमले से डलदेव और डलमऊ के जनमानस का घबरा जाना लाजिमी था। फिर भी वीरो की भूमि डलमऊ के नाम को परिभाषित करते हुए डलदेव और डलमऊ की जनता ने धूर्त इब्राहीम शर्की की सेना से हिम्मत पूर्वक संघर्ष किया लेकिन अचानक हुए हमले में उन्हें सँभलने का मौका तक न मिला और सारे सैनिक भी होली की मस्ती में चूर थे। राजा डलदेव और डलमऊ की वीर जनता ने मरते दम तक दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब दिया लेकिन इस धूर्ततापूर्ण और कायरतापूर्ण हमले के लिए ना तो राजा डलदेव तैयार थे न उनकी सेना और न ही डलमऊ के बाशिंदे। इस अचानक हुए हमले में बहुत से डलमऊ के सैनिक और बाशिंदे शहीद हुए और अन्तत: राजा डलदेव भी वीरतापूर्वक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। लोग तो यहाँ तक कहते हैं की राजा डलदेव का सर कट जाने के बाद भी वो लड़ते रहे और कई दुश्मनों को मौत के घाट उतार दिया। जनश्रुतियों के अनुसार युद्ध हो रहा था तो राजा डलदेव की मृत्यु के बाद धूर्त शर्की ने जब अपने कदम राजा डलदेव के अन्तःपुर की और बढ़ाये तो रानी और वहां की अन्य महिलाओं ने माँ गंगा से उनकी अस्मत बचाने की प्रार्थना की तो राजा डलदेव किला का दक्षिणी हिस्सा ध्वस्त होकर माँ गंगा की गोद मे समाहित हो गया और शर्की के मंसूबे ख़ाक हो गए।

भार शिव राजा डालदेव एवं बालदेव के एक भव्य मन्दिर डलमऊ से 4 किमी दक्षिण-पूर्व पखरौली में बना हुआ है जिसमे राजा डालदेव का शीश आज भी स्थापित है जिस पर प्रति वर्ष क्षेत्रीय जन सावन के महीने में दूध चढाते हैं। सदियों पूर्व घटित यह लोमहर्षक घटना आज भी क्षेत्रवासियों के जेहन में ताजा है और अपने प्रतापी राजा की याद में होली पांच दिन बाद मनाते है। विश्व के इतिहास में अपने लोकप्रिय राजा को सम्मान देने का यह अनुपम उदाहरण है।

जग-जाहिर है कि हिंदुस्तान और बाकी दुनिया भर में होली रंग-गुलाल, हर्षोल्लास-भाईचारे का त्योहार है…लेकिन अगर कोई आपसे कहे कि यह त्योहार ‘मातम’ का है। तो आपको कदापि विश्वास नहीं होगा. आप न कुछ करिए। न बहुत ज्यादा दिमाग पर जोर देकर सोचिए. सच यही है।

द फ्रीडम स्टॉफ
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