खेल

दीपा मलिक जिन्होंने सकारात्‍मक सोच के बूते दिव्‍यांगता को गौण कर दिया

नई दिल्ली: रियो पैरालंपिक में रजत पदक पाने वाली पैरा एथलीट दीपा मलिक को देश के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने खेल के सर्वोच्च पुरस्कार राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार से नवाजा है। पैरा खेलों में महत्वपूर्ण उपलब्धियों के लिए उन्हें यह सम्मान मिला है। खेल रत्न पाकर दीपा कहती हैं कि अब उनमें कुछ ज्यादा करने का जोश और बढ़ गया है।

दीपा मलिक के सीने के नीचे का हिस्सा संवेदनशून्य है। केवल हाथ काम करते हैं और सकारात्मक सोच उन्हें आगे ले जाती है। छह साल की छोटी सी उम्र में स्पाइनल कॉर्ड में ट्यूमर हुआ था लेकिन एक ऑपरेशन के बाद इसे निकाल लिया गया। शादी हुई और दो बेटियां भी हुईं। शादी के दस साल बाद वे 3 जून, 1999 को आखिरी बार अपने पैरों पर चलकर ऑपरेशन थियेटर में गईं। तीन ऑपरेशन और 183 टांकों के बाद उनकी छाती के नीचे के अंगों ने काम करना बंद कर दिया। लेकिन वे रुकी नहीं, थकी नहीं। इसी शरीर से उठना-बैठना सीखा और खेलों में नाम कमाकर एक उदाहरण बन गईं।

दीपा मलिक ऐसी महिला हैं, जिन्होंने दिव्यांगता को अपनी उपलब्धियों से गौण कर दिया। अपना रास्ता खुद बनाकर देश में सबसे आगे रहने का गौरव कई बार प्राप्त किया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन किया। आज उनकी मेहनत को एक बार फिर से सम्मान मिला है। देश के सर्वोच्च खेल पुरस्कार ‘राजीव गांधी खेल रत्न’ पाकर उन्हें लगता है कि एक मंजिल तो मिली है लेकिन कुछ नया करना है। खुद को शारीरिक और मानसिक रूप से फिट रखने के लिए कड़े अनुशासन का पालन करने वाली दीपा मलिक ‘फिट इंडिया मूवमेंट’ की एक सजग मिसाल हैं।

खेल रत्न पाकर कैसा लग रहा है? इस प्रश्न के जवाब में दीपा कहती हैं, ‘लग रहा है जैसे एक मंजिल मिल गई है। लेकिन जब एक मंजिल मिलती है तो अगली मंजिल पाने का हौसला बढ़ जाता है। मुझे लग रहा था कि खेल रत्न मिल गया है तो मेरे अंदर के खिलाड़ी को लगेगा कि काफी कुछ पा लिया लेकिन इस सम्मान के मिलने के बाद तो मुझमें और ज्यादा जोश आ गया है। मुझे लगता है कि कुछ और करना चाहिए। तो कहीं खत्म होने का पड़ाव तो कहीं एक नई शुरुआत का पड़ाव लग रहा है।


द फ्रीडम स्टॉफ
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